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श्राद्ध का सच्चा अर्थ: पितरों की तृप्ति और हमारे कर्तव्य

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श्राद्ध: केवल पितरों की तृप्ति नहीं, अपने कर्तव्य को समझने का अवसर जब कोई चीज़ हमारी होती है, तो उसके प्रति हमारा भाव अलग होता है। बच्चा माँ के लिए अच्छा ही होता है। लेकिन बात केवल “अच्छा” होने की नहीं है। बात यह है कि हमारा कौन है और हम किसके हैं। प्रेरणामूर्ति भारती श्रीजी ने इसी भाव को समझाते हुए एक बहुत गहरी बात कही— “ईश्वर के बनके संसार में रहें तो दिक्कत नहीं है, पर संसार के बनकर ईश्वर के रहें तो दिक्कत है।” पति की बनकर पत्नी संसार में जाए, लोगों से मिले, बाजार जाए, खरीदारी करे—इसमें कोई समस्या नहीं। समस्या तब है जब वह किसी और की बनकर पति के घर में आए। इसी प्रकार हमारी वृत्तियाँ, हमारी इंद्रियाँ, हमारा मन और हमारी बुद्धि संसार में अपना व्यवहार करें, लेकिन परमात्मा के होकर करें—तो जीवन में प्रसन्नता है। कठिनाई तब शुरू होती है जब हम संसार के होकर परमात्मा से संबंध रखने लगते हैं। यही भाव आगे श्राद्ध और पितरों की चर्चा में भी एक महत्वपूर्ण दृष्टि देता है—हमारे संबंध केवल बाहरी कर्म से नहीं, हमारे भाव और कर्तव्य से बनते हैं। यह चर्चा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? श्राद्ध का समय चल रहा...