भाग 2: त्याग और तितिक्षा
वैराग्य बना जब जीवन का श्रृंगार: एक साध्वी की अग्निपरीक्षा श्रृंखला परिचय यह विशेष तीन-भागों की श्रृंखला का दूसरा अध्याय है, जो पूज्य श्री लक्ष्मीदेवी जी (मैयाजी) के जीवन की प्रेरक यात्रा को आगे बढ़ाता है। मैयाजी के हृदय की गहराई से एक-एक मोती लेकर उसे पुस्तक-रूपी माला में पिरोने का दुष्कर कार्य उनकी लाड़ली सुपुत्री, प्रेरणामूर्ति भारती जी ने किया है और उसी ‘ज्ञान की गहराई’ पुस्तक से इस लेख की प्रेरणा और संदर्भ ग्रहण किए गए हैं। पहले भाग में हमने उनके संस्कारों की नींव देखी थी। अब हम उस दौर में प्रवेश करते हैं जहाँ जीवन ने उन्हें परखा— और उन्होंने परीक्षा को ही साधना बना दिया। यह वह समय था जब विवाह के बाद त्याग, संघर्ष और तप ने उन्हें एक नई पहचान दी। परिचय: जब विवाह बना वैराग्य का द्वार विवाह को अक्सर जीवन का सबसे सुखद मोड़ कहा जाता है— नई शुरुआत, नए सपने, नई उम्मीदें। लेकिन लक्ष्मीदेवी (पूर्व नाम कलावती) के लिए विवाह की परिभाषा अलग थी। उनके लिए यह संबंध संसार में रमने का अवसर नहीं, बल्कि परमात्मा की ओर बढ़ने का एक मार्ग बन गया। इस भाग में हम जानेंगे— कैसे एक नवविवा...