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रामजी ने किया नवरात्रि व्रत — श्रीराम की अनसुनी व्रत क

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नवरात्रि से जुड़ी अधिकतर कथाएँ हम बचपन से सुनते आए हैं — माँ दुर्गा का महिषासुर वध, या फिर रामजी का रावण पर विजय पाना। पर एक प्रसंग ऐसा भी है जो सामान्य जनसमुदाय में उतना प्रचलित नहीं है: स्वयं भगवान श्रीराम ने रावण का वध करने से पहले नवरात्रि व्रत किया था। यह कथा देवी भागवत पुराण की परंपरा में मिलती है, और इसकी जड़ें माँ सीता के एक पूर्व जन्म से जुड़ी हैं। श्रीराम द्वारा माँ भगवती की आराधना माता सीता के शाप की कथा एक मुनि-पुत्री तपस्विनी वन में तप कर रही थीं। एक दैत्य ने बलपूर्वक उन्हें विवाह के लिए विवश करने की कोशिश की। बार-बार मना करने पर भी जब दैत्य ने दुराग्रह नहीं छोड़ा, तो तपस्विनी ने शाप दिया — तुम्हारे संहार के लिए मैं स्त्रीरूप में जन्म लूँगी, और मेरे उस अवतार का माता के गर्भ से कोई संबंध नहीं होगा। यही तपस्विनी आगे चलकर सीताजी के रूप में प्रकट हुईं, और वह दैत्य रावण था। यही कारण है कि सीताजी अयोध्याकांड में राजा जनक को हल जोतते समय भूमि से प्राप्त हुई थीं — जन्म नहीं, प्राकट्य। राम का विलाप और नारदजी का आगमन जब रावण सीताजी का हरण करके ले गया, तो श्रीराम विरह में ...

श्राद्ध का सच्चा अर्थ: पितरों की तृप्ति और हमारे कर्तव्य

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श्राद्ध: केवल पितरों की तृप्ति नहीं, अपने कर्तव्य को समझने का अवसर जब कोई चीज़ हमारी होती है, तो उसके प्रति हमारा भाव अलग होता है। बच्चा माँ के लिए अच्छा ही होता है। लेकिन बात केवल “अच्छा” होने की नहीं है। बात यह है कि हमारा कौन है और हम किसके हैं। प्रेरणामूर्ति भारती श्रीजी ने इसी भाव को समझाते हुए एक बहुत गहरी बात कही— “ईश्वर के बनके संसार में रहें तो दिक्कत नहीं है, पर संसार के बनकर ईश्वर के रहें तो दिक्कत है।” पति की बनकर पत्नी संसार में जाए, लोगों से मिले, बाजार जाए, खरीदारी करे—इसमें कोई समस्या नहीं। समस्या तब है जब वह किसी और की बनकर पति के घर में आए। इसी प्रकार हमारी वृत्तियाँ, हमारी इंद्रियाँ, हमारा मन और हमारी बुद्धि संसार में अपना व्यवहार करें, लेकिन परमात्मा के होकर करें—तो जीवन में प्रसन्नता है। कठिनाई तब शुरू होती है जब हम संसार के होकर परमात्मा से संबंध रखने लगते हैं। यही भाव आगे श्राद्ध और पितरों की चर्चा में भी एक महत्वपूर्ण दृष्टि देता है—हमारे संबंध केवल बाहरी कर्म से नहीं, हमारे भाव और कर्तव्य से बनते हैं। यह चर्चा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? श्राद्ध का समय चल रहा...